शनिवार, 16 मई 2009

सर्वज्ञानी होने का दंभ

ये पोस्ट इंटर एक्शन ब्लाग से सचिन ने आजाद आवाज़ को मेल की है। सचिन आई नेक्स्ट कानपुर के दौर के साथी हैं और इन दिनों इंदौर में हैं :

ब्लेज बोनपेन (Blase Bonpane) एक अमेरिकी मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और इस समय लॉस एजेंलस में पैसिफिका नेटवर्क स्टेशन केपीएफके पर वर्ल्ड फोकस नाम के रेडियो कार्यक्रम का संचालन करते हैं। उन्होंने क्रांति की प्रक्रिया पर यह लेख 1983 में लिखा था। इसमें से कुछ बातें मुझे काफी मज़ेदार लगी, आप अपनी कहें, और यहां पसरा सन्नाटा तोडें।
हम कोई काम करने से पहले यह इंतज़ार नहीं करते कि पहले इस काम में पूर्णता हासिल कर लें, तभी करेंगे। जो लोग पूर्णता या परफेक्शन का इंतज़ार करते रहते हैं, वे बिना कुछ किए सारा जीवन गुज़ार देते हैं और इसी तरह एक दिन मर-खप जाते हैं।
हम सभी के पास सच का थोड़ा-थोड़ा अंश होता है और जब हम समझ जाते हैं कि हम साथ-साथ काम कर सकते हैं तो हम जान लेते हैं कि क्रांति क्या चीज़ है और विभिन्न सामाजिक शक्तियों को साथ लाने की कला क्या है। यह ऐसी कला नहीं होती जिसमें सभी सवालों के जवाब का दावा किया जाता है। बल्कि जो लोग इस तरह का सर्वज्ञानी होने का दंभ भरते हैं, वे खुद ही समस्या होते हैं। जिनके पास पहले से तैयार उत्तर होते हैं, वो भले ही अग्रणी नेता होने का दावा कर लें, लेकिन असल में ऐसे होते नहीं हैं। नेता तो संघर्ष की प्रक्रिया में तैयार होते हैं।
बदलाव की प्रक्रिया में लगे लोग अपनी पूरी सृजनात्मकता के साथ, संस्कृति के साथ, हंसते-गाते और नाचते हुए नेतृत्व का विकास करते हैं। जो हंस नहीं सकते, नाच नहीं सकते, उनके साथ कुछ न कुछ गड़बड़ ज़रूर होती है। ऐसे सुपर-लेफ्टिस्टों ने बार-बार खुद को प्रतिक्रांतिकारी ही साबित किया है।
आपको दुनिया भर में लोगों की सृजनात्मकता को देखना-परखना चाहिए कि वो कैसे बदलाव को संभव बनाते हैं। अगर आप क्रांति कर रहे हैं तो अवाम की संस्कृति पर हमला नहीं करते। आप उनकी संस्कृति के प्रति सम्मान दिखाते हैं। उनकी संस्कृति के साथ जुड़ते हैं और तब आप देखते हैं गीत-संगीत और नृत्य का एक विस्फोट, जो पूरे आंदोलन में रहस्यमयता भर देता है।हर क्रांति में रहस्य का तत्व होता है। ऐसी कोई क्रांति नहीं है जो नाच नहीं सकती। अगर वह नाच नहीं सकती तो वह क्रांति नहीं हो सकती। अगर उसमें संगीत नहीं है तो वह क्रांति नहीं हो सकती। अगर उसमें उल्लास नहीं है तो वह क्रांति नहीं है।
कोई भी बदलाव स्थाई तभी होता है जब वह सामूहिक होता है। और इतिहास खुद को दोहराता नहीं। इतिहास कभी पीछे भी नहीं जाता। यह धारणा क्रांतिकारी की बुनियादी सोच का हिस्सा है। जिंदगी को आप विखंडित प्रवाह के रूप में नहीं देखते। आप रूसी क्रांति की नकल नहीं करते। आप क्यूबा की क्रांति की नकल नहीं करते। आप चीन की क्रांति की नकल नहीं करते।
क्रांति में प्यार करने जैसा उन्माद होता है। आप प्यार से कोई मोटर गाड़ी बना सकते हैं। आप प्यार के दम पर नई राजनीतिक व्यवस्था बना सकते हैं। आप व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं, सरकार को भी प्यार का वाहक बना देते हैं। सरकार जो कहती है कि मेडिकल केयर अवाम का हक है, वो असल में प्यार को व्यवस्थित कर रही होती है। जो सरकार कहती है कि शिक्षा हर किसी को मिलनी चाहिए, वो दरअसल प्यार की व्यवस्था बना रही होती है। प्यार महज व्यक्तिगत चीज़ नहीं है, बल्कि इसे सामूहिक भी बनाया जा सकता है। और अपने उच्चतम रूप में इसे अवाम के समान हितों की सामूहिकता में देखा जाएगा।

6 टिप्‍पणियां:

  1. हिंदी ब्लॉग की दुनिया में आपका तहेदिल से स्वागत है....

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  2. बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

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  3. बहुत सुंदर.हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं। मेरे ब्लोग पर भी आने की जहमत करें।

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  4. हुज़ूर आपका भी .......एहतिराम करता चलूं .....
    इधर से गुज़रा था- सोचा- सलाम करता चलूं ऽऽऽऽऽऽऽऽ

    कृपया एक अत्यंत-आवश्यक समसामयिक व्यंग्य को पूरा करने में मेरी मदद करें। मेरा पता है:-
    www.samwaadghar.blogspot.com
    शुभकामनाओं सहित
    संजय ग्रोवर

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