सोमवार, २८ सितम्बर २००९
एक कहानी और मिली
Many years ago in a small Indian village, A farmer had the misfortune of owing a large sum of money to a villagemoneylender. The Moneylender, who was old and ugly, fancied thefarmer's beautiful Daughter. So he proposed a bargain. He said he would forgo the farmer's debt if he could marry hisDaughter. Both the farmer and his daughter were horrified by theProposal. So the cunning money-lender suggested that they let Providence decidethe matter. He told them that he would put a black Pebble and a whitepebble into an empty money bag. Then the girl would have to pick onepebble from the bag. 1) If she picked the black pebble, she would become his wife and herfather's debt would be forgiven. 2) If she picked the white pebble she need not marry him and herfather's debt would still be forgiven. 3) But if she refused to pick a pebble, her father would be thrown into Jail. They were standing on a pebble strewn path in the farmer's field. AsThey talked, the moneylender bent over to pick up two pebbles. As hePicked them up, the sharp-eyed girl noticed that he had picked up twoBlack pebbles and put them into the bag. He then asked the girl to pick A pebble from the bag. Now, imagine that you were standing in the field. What would you haveDone if you were the girl? If you had to advise her, what would youHave told her? Careful analysis would produce three possibilities: 1. The girl should refuse to take a pebble. 2. The girl should show that there were two black pebbles in the bagAnd expose the money-lender as a cheat. 3. The girl should pick a black pebble and sacrifice herself in orderTo save her father from his debt and imprisonment. Take a moment to ponder over the story. The above story is used withThe hope that it will make us appreciate the difference betweenlateral And logical thinking. The girl's dilemma cannot be solved with Traditional logical thinking.Think of the consequences if she chooses The above logical answers. What would you recommend to the Girl to do? Well, here is what she did .... The girl put her hand into the moneybag and drew out a pebble. WithoutLooking at it, she fumbled and let it fall onto the pebble-strewn pathWhere it immediately became lost among all the other pebbles. "Oh, how clumsy of me," she said. "But never mind, if you look intothe Bag for the one that is left, you will be able to tell whichpebble I Picked." Since the remaining pebble is black, it must be assumed that she hadPicked the white one. And since the money-lender dared not admit hisDishonesty, the girl changed what seemed an impossible situation intoAn extremely advantageous one.
MORAL OF THE STORY:Most complex problems do have a solution. It is only that we don'tAttempt to think.
सोमवार, ३१ अगस्त २००९
झूठ बोलते हैं ये जहाज बच्चों!

अवतार सिंह पाश
झूठ बोलते हैं
ये जहाज, बच्चों!
इनका सच न मानना
तुम खेलते रहो
घर बनाने का खेल...
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वे रेडियो नहीं सुनते
अखबार नहीं पढ़ते
जहाज खेतों में ही दे जाते हैं खबर सारी
हल को पकड़ कर वे केवल हंस देते हैं
क्योंकि वे समझते हैं कि हल की फाल पगली नहीं
पगली तो तोप होती है
हम अंधेरे कोनों में
गुमसुम बैठे सोच रहे हैं
और पल भर में चांद उगेगा
भूरा-भूरा सा
लूटा-लूटा सा
तो बच्चों को कैसे बताएंगे
इस तरह का चांद होता है ?
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रेडियो से कहो
कसम खाकर तो कहे
धरती अगर मां होती है तो किसकी ?
यह पाकिस्तानियों की क्या हुई ?
और भारत वालों की क्या लगी ?
असफल होना बेईमानी करने से कहीं ज्यादा सम्मानजनक है

गुरु और छात्रों के बीच दूरी बढ़ी है। दरअसल आजके बाजारवाद में शिक्षा भी एक एक प्रोडक्ट है और बाजार में रिश्तों की कद्र कोई नहीं है। ऐसे में अमरीकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का ये पत्र काफी मौजूं हैं।
'' मैं जानता हूँ कि उसे यह सीखना होगा कि सभी आदमी ईमानदार नहीं होते ओर सभी सच्चे नहीं होते, लेकिन उसे यह भी सिखाइए, कि जितने दुष्ट हैं, उतने लायक भी हैं; कि जितने स्वार्थी राजनीतिज्ञ हैं, उतने समर्पित नेता हैं…उसे यह भी सिखाइए कि यदि दुश्मन हैं; तो उतने ही दोस्त भी हैं। मुझे मालूम है, इसमें समय लगेगा; पर यदि आप कर सकें तो उसे यह भी सिखाइए कि ख़ुद अर्जित एक डॉलर की कीमत कहीं से मिल गए पॉँच डॉलरों से ज्यादा होती है. उसे बताइए कि वह हार को स्वीकार करना सीखें.. और जीत का आनंद लेना भी. उसे ईर्ष्या से दूर ले जाइए, यदि आप ऐसा कर सके, और उसे मृदु हास्य के रहस्य से परिचित कराइए. उसे कम उम्र में ही यह सिखाइए कि बदमाशों को पीटना सबसे आसान होता है. उसे पुस्तकों की अद्भुत दुनिया के बारे में बताइए, लेकिन उसे आकाश में उड़ते पंछियों, धुप में फिरती मधु मक्खियों और हरी पहाड़ियों पर खिले फूलों के शाश्वत रहस्य पर दिमाग दौड़ने के लिए भी तो समय दीजिए.स्कूल में उसे यह सिखाइए कि असफल होना बेईमानी करने से कहीं ज्यादा सम्मानजनक है। उसे अपने ख़ुद के विचारों में आस्था रखना सिखाइए भले ही हर कोई कह रहा हो कि वे ग़लत हैं….उसे नम्र लोगों के साथ नम्रता से तथा कठोर लोगों से कठोरता से पेश आना सिखाइए और मेरे बच्चे को ऐसी मजबूती देने की कोशिश कीजिए कि जब हर कोई सफलता के पीछे भाग रहा हो, तब भी वह भीड़ के पीछे ना चलें. उसे सिखाइए कि वह सबकी बात सुनें. उसे सच्चाई के छन्ने से छाने और जो अच्छाई हो, उसे ग्रहण करे.उसे उदासी में भी हँसाना सिखाइए. उसे इंसानी गुणों से द्वेष करने वाले पर हँसना सिखाइए और बहुत ज्यादा मिठास से सावधान रहना सिखाइए. उसे सिखाइए कि वह अपने बल और बुद्धि का अधिकतम मूल्य लगाये पर कभी भी अपने हृदय और आत्मा की कीमत न लगाये. उसे यह भी सिखाइए कि अगर वह समझता है कि वह सही है तो चीखती-चिल्लाती भीड़ पर ध्यान न दे और दृढ़ता से लड़ाई लड़े. उसके साथ नम्रता से पेश आयें. मगर उसे दुलराएँ नहीं क्योंकि अग्नि परीक्षा से गुज़र कर ही असली फौलाद तैयार होता है. उसे अधीर होने का साहस करने दीजिए…. और उसे साहसी होने का धीरज भी सिखाइए. उसे हमेशा अपने में आस्था रखना सिखाइए, क्योंकि तभी वह मानव जाती में उदात आस्था रख सकेगा.''
० अब्राहम लिंकन का हेडमास्टर के नाम पत्र
रविवार, २३ अगस्त २००९
सबसे ख़तरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
गद्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती
बैठे-बिठाए पकड़े जाना बुरा तो है
सहमी-सी चुप में जकड़े जाना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
कपट के शोर में सही होते हुए भी दब जाना बुरा तो है
जुगनुओं की लौ में पढ़ना
मुट्ठियां भींचकर बस वक़्त निकाल लेना बुरा तो है
सबसे ख़तरनाक नहीं होता
सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सब कुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना
सबसे ख़तरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना
सबसे ख़तरनाक वो घड़ी होती है
आपकी कलाई पर चलती हुई भी जो
आपकी नज़र में रुकी होती है
सबसे ख़तरनाक वो आंख होती है
जिसकी नज़र दुनिया को मोहब्बत से चूमना भूल जाती है
और जो एक घटिया दोहराव के क्रम में खो जाती है
सबसे ख़तरनाक वो गीत होता है
जो मरसिए की तरह पढ़ा जाता है
आतंकित लोगों के दरवाज़ों परगुंडों की तरह अकड़ता है
सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्या कांड के बाद वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में मिर्चों की तरह नहीं पड़ता
सबसे ख़तरनाक वो दिशा होती है
जिसमें आत्मा का सूरज डूब जाए
और जिसकी मुर्दा धूप का कोई टुकड़ा
आपके जिस्म के पूरब में चुभ जाए
मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
गद्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती ।
0 अवतार सिंह पाश
सोमवार, २० जुलाई २००९
एक टिप्पणी
are good.But the article"sarvgyani hone ka dambh"
appealed me most.I am attaching herewith my
comment on it.
with best wishes
Ranjeet Panchalay
शनिवार, २३ मई २००९
'मज़हबी बिल्कुल नहीं थे मंटो'

सआदत हसन का जन्म 11 मई, 1912 को अमृतसर के ख़ानदानी बैरिस्टर परिवार में हुआ था.
लेकिन उनकी क्रांतिकारी सोच और अतिसंवेदनशील लेखनी से 'मंटो' के रूप में उन्हें पूरी दुनिया में शोहरत मिली.
पैदाइशी अफसानानिगार मंटो अगर आज जीवित होते तो उनकी उम्र 97 साल होती.
पेश है उनकी बड़ी बेटी निकहत पटेल से हुई बातचीत के अंशः
धुंधली सी याद है मुझे, बावर्चीखाने में खड़े हुए अपनी पसंद की डिश या पकोड़े अक्सर बनाया करते थे। तो इस तरह उनके साथ जो भी वक्त गुजरा ज़हन में आज भी है.
विवादों को आपकी अम्मी जान ने किस तरह लिया?
बस अम्मी से उनकी झड़प शराबनोशी को लेकर हुआ करती थी. और उस वक्त भी वह अपनी कमज़ोरी और गलतियों को मान लेते थे.
'मनो मिट्टी के नीचे दफन सआदत हसन मंटो आज भी यह सोचता है कि सबसे बड़ा अफसाना निगार वह है या ख़ुदा।' मंटो की इस इबारत में आपको आत्मविश्वास और चुनौती नज़र आती है या ग़ुरूर?
अगर अब्बा जान मंटो से कोई एक बात कहनी हो, तो वो क्या होगी?
यही कि... ‘काश आपने शराबनोशी न की होती तो....हमें आपके साथ ज़्यादा रहने का मौका मिला होता....’ बस इतना ही।
शनिवार, १६ मई २००९
सर्वज्ञानी होने का दंभ
ब्लेज बोनपेन (Blase Bonpane) एक अमेरिकी मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं और इस समय लॉस एजेंलस में पैसिफिका नेटवर्क स्टेशन केपीएफके पर वर्ल्ड फोकस नाम के रेडियो कार्यक्रम का संचालन करते हैं। उन्होंने क्रांति की प्रक्रिया पर यह लेख 1983 में लिखा था। इसमें से कुछ बातें मुझे काफी मज़ेदार लगी, आप अपनी कहें, और यहां पसरा सन्नाटा तोडें।
हम कोई काम करने से पहले यह इंतज़ार नहीं करते कि पहले इस काम में पूर्णता हासिल कर लें, तभी करेंगे। जो लोग पूर्णता या परफेक्शन का इंतज़ार करते रहते हैं, वे बिना कुछ किए सारा जीवन गुज़ार देते हैं और इसी तरह एक दिन मर-खप जाते हैं।
हम सभी के पास सच का थोड़ा-थोड़ा अंश होता है और जब हम समझ जाते हैं कि हम साथ-साथ काम कर सकते हैं तो हम जान लेते हैं कि क्रांति क्या चीज़ है और विभिन्न सामाजिक शक्तियों को साथ लाने की कला क्या है। यह ऐसी कला नहीं होती जिसमें सभी सवालों के जवाब का दावा किया जाता है। बल्कि जो लोग इस तरह का सर्वज्ञानी होने का दंभ भरते हैं, वे खुद ही समस्या होते हैं। जिनके पास पहले से तैयार उत्तर होते हैं, वो भले ही अग्रणी नेता होने का दावा कर लें, लेकिन असल में ऐसे होते नहीं हैं। नेता तो संघर्ष की प्रक्रिया में तैयार होते हैं।
बदलाव की प्रक्रिया में लगे लोग अपनी पूरी सृजनात्मकता के साथ, संस्कृति के साथ, हंसते-गाते और नाचते हुए नेतृत्व का विकास करते हैं। जो हंस नहीं सकते, नाच नहीं सकते, उनके साथ कुछ न कुछ गड़बड़ ज़रूर होती है। ऐसे सुपर-लेफ्टिस्टों ने बार-बार खुद को प्रतिक्रांतिकारी ही साबित किया है।
आपको दुनिया भर में लोगों की सृजनात्मकता को देखना-परखना चाहिए कि वो कैसे बदलाव को संभव बनाते हैं। अगर आप क्रांति कर रहे हैं तो अवाम की संस्कृति पर हमला नहीं करते। आप उनकी संस्कृति के प्रति सम्मान दिखाते हैं। उनकी संस्कृति के साथ जुड़ते हैं और तब आप देखते हैं गीत-संगीत और नृत्य का एक विस्फोट, जो पूरे आंदोलन में रहस्यमयता भर देता है।हर क्रांति में रहस्य का तत्व होता है। ऐसी कोई क्रांति नहीं है जो नाच नहीं सकती। अगर वह नाच नहीं सकती तो वह क्रांति नहीं हो सकती। अगर उसमें संगीत नहीं है तो वह क्रांति नहीं हो सकती। अगर उसमें उल्लास नहीं है तो वह क्रांति नहीं है।
कोई भी बदलाव स्थाई तभी होता है जब वह सामूहिक होता है। और इतिहास खुद को दोहराता नहीं। इतिहास कभी पीछे भी नहीं जाता। यह धारणा क्रांतिकारी की बुनियादी सोच का हिस्सा है। जिंदगी को आप विखंडित प्रवाह के रूप में नहीं देखते। आप रूसी क्रांति की नकल नहीं करते। आप क्यूबा की क्रांति की नकल नहीं करते। आप चीन की क्रांति की नकल नहीं करते।
क्रांति में प्यार करने जैसा उन्माद होता है। आप प्यार से कोई मोटर गाड़ी बना सकते हैं। आप प्यार के दम पर नई राजनीतिक व्यवस्था बना सकते हैं। आप व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं, सरकार को भी प्यार का वाहक बना देते हैं। सरकार जो कहती है कि मेडिकल केयर अवाम का हक है, वो असल में प्यार को व्यवस्थित कर रही होती है। जो सरकार कहती है कि शिक्षा हर किसी को मिलनी चाहिए, वो दरअसल प्यार की व्यवस्था बना रही होती है। प्यार महज व्यक्तिगत चीज़ नहीं है, बल्कि इसे सामूहिक भी बनाया जा सकता है। और अपने उच्चतम रूप में इसे अवाम के समान हितों की सामूहिकता में देखा जाएगा।
गुरुवार, ३० अप्रैल २००९
जीये जाने का दस्तूर है

कहानी में कहा गया था कि एक पत्रकार है, जो बहुत व्यस्त रहता है। यहां तक कि उसके पास अपनी बीवी के पास भी वक्त नहीं है। वह दोनों जब कभी एक साथ सब्जी खरीदने जाते हैं, तभी उनके पास बात करने को वक्त होता है। बात करने और पति का साथ लंबा चले, इसलिए पत्नी काफी ज्यादा और देर तक सब्जी खरीदती रहती है।
ये तो जिंदगी का एक पहलू है, लेकिन एक दूसरा पहलू भी है। याद करें आप खुद से कब रूबरू हुए थे। गौर करें तो हममें से ज्यादातर लोगों को खुद से मिले हुए लंबा अरसा गुजर गया है। जिंदग भी जीते चले जाने का दस्तूर हो गई है! जीना भी एक आदत है! जैसे खाना खाना एक आदत है!
मीडिया, मेडिकल और मैनेजमेंट से जुड़े लोग खुद फरामोशी के शिकार ज्यादा हैं। उनसे बात करें तो पता चलता है कि वह अपने आप से कितना दूर जा चुके हैं। उन्हें नहीं पता कि उन्हें क्या खाना पसंद है! एक उम्दा नींद लिए जमाना गुजर गया है। ऐसा कोई दिन गुजरे भी अरसा हो गया है, जब उन्होंने आहिस्ता-आहिस्ता सारे काम किए हों, गुनगुनाते हुए। उन्हें याद नहीं कि जाने भी दो यारो जैसी फिल्म उन्होंने कब इत्मीनान से देखी है। मनपसंद किताब पढ़े हुए काफी वक्त हो चला है। उगता सूरज महीनों से नहीं देखा। चिड़ियों की चहचहाहट कब सुनी थी याद नहीं। तितली का उड़ना भी देखे हुए काफी समय निकल गया। किसी करीबी दोस्त से घंटों बैठ कर गपियाये हुए भी काफी दिन हो गए। बचपन का गांव और गलियों को देखना तो दूर उनके बारे में सोचने की भी फुरसत नहीं। बस जागने से सोने तक काम है। भागना है और बाकी वक्त में अजब सी उलझन है। फ्यूचर की फिक्र। कौन से असाइनमेंट अधूरे हैं और कौन से अपाइंटमेंट पूरे करने हैं। जिंदगी इसी में गुजरी जा रही है।
जिंदगी बस जीते चले जाने का नाम हो चली है।
चांद तारे छूने की चाहत में एक पूरी पीढ़ी जवानी में ही बुढ़ाने लगी है।
दोस्त! हफ्ते में नहीं तो महीने में कम से कम एक दिन तो निकालें खुद से मिलने के लिए, वरना इस भीड़ में गुम जाने का खतरा बना हुआ है।
जिंदगी नूर है, मगर जीये जाने का दस्तूर है।
