शनिवार, 11 अप्रैल 2009

दिखावे पर मत जाओ, अपनी अक़ल लगाओ

कई साल पहले एक साफ्ट ड्रिंक का ऐड आया था, उसकी पंच लाइन थी, दिखावे पर मत जाओ अपनी अकल लगाओ। इस ऐड फिल्म में दिखाया गया थाः ये हैं मशहूर माडल लिजा रे। इनकी खूबसूरता का राज है, फलाना साफ्ट ड्रिंक। ये रोज नहाती हैं इसी फलाने ड्रिंक से। फिर बैकग्राउंड से आवाज आती हैः लोगों को पैसे दो तो वह कुछ भी बोलने को तैयार हो जाते हैं। ऐसा ही हाल मीडिया का हो रहा है। इन्हें पैसे दो या कोई लाभ दिखे तो ये कुछ भी कहने-दिखाने को तैयार बैठे हैं।
ऐसे मीडिया के प्रति जनता को जागरूक होना चाहिए। वह समझें कि जो दिखाया-बताया जा रहा है वह कितना सही है। समझें कि कौन सा समाचार क्यों है? उसे इतना वाइड स्पेस क्यों दिया जा रहा है? इसे प्राथमिकता क्यों दी जा रही है? आज के मीडिया ग्रुप का ये बड़ा खेल है। इसे सभी को समझना जरूरी है। वरुण गांधी मामले में भी ऐसा ही हुआ है। इस मामले में मीडिया के एक ग्रुप ने १९९२-९३ जैसे हालात पैदा करने की कोशिश की। दरअसल ९२ से देश और समाज में कई बड़े बदलाव आए हैं, मीडिया का भी बुरी तरह से सांप्रदायीकरण हुआ है। उसे जहां मुस्लिम विरोध के कोई तत्व मिले, वह मुखर हुआ है। उसने लोगों को हीरो बनाने में भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। मीडिया माले गांव के मुल्जिमों के लिए तो "आरोपी" शब्द इस्तेमाल करती है, लेकिन जहां चार मुस्लिम नौजवान पुलिस पकड़ती है, उसकी खबर होती है, "चार खतरनाक आतंकी पकड़े गए"। मीडिया यहां अपने एथिक्स और नियम-कायदे भी भूल जाती है। वह खुद ही अदालत बनकर उन्हें आतंकी करार दे देती है। यहां तक कि उन्हें खतरनाक भी करार दे दिया जाता है, बिना किसी तर्क के। वरुण पर खुद भी कई गंभीर मामले हैं, लेकिन मीडिया उन्हें हीरो बताती है। मीडिया का चरित्र हीरो गढ़ने का है वो, हीरो बनती है। उसे बेचती है और उसकी आड़ में खुद बिकती है। कभी उसे बाल ठाकरे हीरो लगते हैं, कभी रथ यात्री आडवाणी। कभी वरुण गांधी के रूप में उसे हीरो मिल जाते हैं। मीडिया इन सभी को हीरो बनाने के पीछे तर्क देती है कि पाठक इन्हें पढ़ना चाहते हैं। देखा जाए तो पाठक पॉर्न मसाला भी पढ़ना चाहते हैं, क्या मीडिया इसके लिए तैयार है? वह यह एथिक्स की बात करती है। खास बात ये भी है कि जिस पीलीभीत से वरुण भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी हैं, वहीं पर चार-पांच महीने पहले भाजपा के ही एक पूर्व विधायक पर रासुका लगती है, लेकिन अखबारों के लिए ये बड़ी खबर नहीं है। जाहिर है कि उसमें हीरो बनने के तत्व नहीं रहे होंगे? उस घटना में मुस्लिम विरोध भी नहीं था? न ही वह खबर बिकाऊ माल ही थी।

1 टिप्पणी:

  1. रहमान भाई एस नई शुरुआत के लिए बधाई. आप की बात बिलकुल जायज़ है और आप के पास अकाट्य तर्क भी हैं लेकिन वरुण गाँधी के मामले में रासुका लगा कर राज्य सरकार ने उनकी पार्टी को फायदा पहुँचाने का काम किया है और ये निसंदेह मुस्लिम वोटर्स को रिझाने के लिए ही किया गया है...
    + अनवारुल हसन
    निदेशक: वौइस् प्रोडक्शन
    आर जे: १००.७ ऍफ़ एम् रेनबो
    लखनऊ
    http://anwarvoice.blogspot.com

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